एक बंदर की मौत

एक बंदर की मौत

ओ गली में रात लगभग एक बजे से खामोशी होती है, तब वह आवाज साफ सुनाई पड़ती है. वैसे, वह आवाज रोने की नहीं, गाने को ही है. बूढ़ी, बेहद दुबली औरत गाती है. गली के तीसरे, अधगिरे मकान की मंजिल पर एक कमरा है और कमरे के आगे टिन का सायवान. टिन रोकने वाली लकड़ियों को लंबे अर्से से कीड़ों ने खाया है और उनमें से एक किसी ममी की टांग की तरह लटक आई है. सायबान के बीचो-बीच फर्श पर एक बड़ा-सा सुराख है, जिससे नीचे के कमरे के अंदर झांका जा सकता है. इसी सुराख के पास बैठकर वह गाती है.

वह क्या बनाती है, क्या खाती है, कोई नहीं जानता, गोकि इस गली में रहने वाले हर किसी से हर किसी का सीधा सरोकार है. फिर भी उस बूढ़ी औरत की तरफ से हर कोई उदासीन रहता है. खुद उसका बेटा मुचडू भी. शायद ही कभी किसी ने मुचडू को ऊपर जाते देखा हो.

सिर्फ एक बार लोगों का ध्यान उस औरत की तरफ गया था, पर वह बहुत पुरानी बात है, शायद तीस-बत्तीस साल या उससे भी ज्यादा.

यह छोटा-सा दुमंजिला मकान उस वक्त भी ऐसा ही था. नीचे के कमरे में खुलने वाला छत का वह दो बालिश्त दायरे का सुराख भी ऐसा ही था, पर उस वक्त इसमें एक अलग ही किस्म की जिंदगी हुआ करती थी. कुछ मजदूर सुबह-शाम आते थे. वे सुबह भरी हुई बोरी लाते थे और शाम को ले जाते थे. बोरी में समूची अरहर के दाने होते थे. शाम को जब वे ले जाते थे, तो उसी बोरी में अरहर की दाल होती थी. एक बड़ी बोरी में अरहर के दानों के छिलके होते थे, जिन्हें कोई और ले जाता था और एक छोटी थैली में दानों के टूटे कण होते थे.

दरअसल ऊपर की मंजिल पर उस औरत ने पत्थर की एक चक्की लगा रखी थी. इसी में वह सारे दिन अरहर के दाने मुट्ठी में भर-भर कर डालती थी और चक्की के चारों ओर छिलके और दाल का ढेर इक‌ट्ठा होता जाता था. इसे वह धीरे-धीरे फर्श पर बने उस बड़े-से सुराख से नीचे गिराती जाती थी. गिरने पर दाल से छिलके अलग हो जाएं- इसके लिए लगातार किसी अंगोछे को दो बच्चे हिलाते थे, पर बच्चे दो के बजाय कुछ ज्यादा ही इकट्ठे हो जाते थे. औरत चक्की चलाते वक्त बड़ी तन्मयता से गाती थी- मैं कितने मन अनाज कूटूं, कितने मन पीसू मेरे भैया, कितने मन की रसोई पकाऊं, सास मांजने के लिए बर्तनों का ऊंचा ढेर दे देती है…

यहां तक आस-पास वाले लोगों को मालूम था कि वह औरत गाती है, पर उसके बाद एक दिन वहां एक भारी हंगामा हो गया. पड़ोस के कुछ बच्चे उस औरत के अपने बच्चे के साथ मिलकर छत के छेद से नीचे फर्श पर गिरती दाल पर हवा ही नहीं करते थे, वहां खेलते भी थे. इसी खेल में एक बच्चे ने चक्की के अर्द्धचंद्राकार छेद में एक लोटा पानी डाल दिया. जाहिर है, उस औरत के लिए यह कोई खुश होने वाली घटना नहीं थी, क्योंकि न सिर्फ बहुत-सी दाल का नुकसान हुआ था, बल्कि चक्की भी बिना सुखाए, साफ किए काम लायक नहीं रह गई थी. औरत का चेहरा बहुत तेजी से बिगड़ा. उसके दांत दिखाई देने लगे और बाल जैसे अपनी जड़ों पर खड़े हो गए थे. शरारत करने वाला बच्चा अभी तक हंस रहा था, पर अब रोने लगा. औरत ने गुस्से से भरकर उसके कानों के पास एक जोरदार थप्पड़ मारा, थप्पड़ मारने के बाद औरत समझ नहीं पाई कि यकायक क्या हुआ. वह दुबला नन्हा बच्चा बेतहाशा चीखता हुआ एक क्षण दाल गिराए जाने वाले सुराख में अटका दिखा, फिर एकदम गायब हो गया.

औरत सहमकर जीने तक आई और फिर ठिठक गई. गली में इस तरह शोर शुरू हो गया था, जैसे वहां किसी ने बहुत-से जंगली जानवर एक साथ छोड़ दिए हों. महल्ले की गलियों की एक खास सिफत होती है जहां आम तौर पर ज्यादा भीड़ कभी नहीं दिखती और ज्यादातर लोग अलसाए और बेजाने-से लगते हैं, वहीं छोटी-से छोटी घटना पर वे बेहद फुर्ती और तत्परता दिखाते हुए भारी तादाद में जमा हो जाते है. यही हुआ.

इसके बाद पुलिस ने तो कोई खास कार्रवाई नहीं की, पर उस छत पर चक्की की आवाज भी बंद हो गई और गाने की आवाज भी. वह औरत कहीं चली गई. उसके नन्हें बेटे मुचडू को शायद न तो उसके वहां होने से कोई खास सरोकार था और न ही उसके गायब हो जाने से. जब सब बच्चे छत के छेद से गिरती दाल पर अंगोछे से हवा करने का मजा ले रहे होते थे, मुचडू गली के मोड़ के धोबी की इस्तरी में कोयले सुलगाता रहता था. गली के मुहाने पर अड़ी हुई सड़क के श्याम सुंदर हलवाई के चबूतरे पर बैठा इमरतियों के लिए उड़द का आटा घोटता रहता था. मुचडू के लिए वे सब उस काम से बेहतर थे, जो उसकी मां करती थी. मां का खाना भी कुछ अजीब-सा था, जो मुचडू को कभी पसंद नहीं आया. मां जिस अरहर से चक्की पर दाल तैयार करती थी, उसी का एक हिस्सा उसे मेहनताने के अलावा मिल जाया करता था. वह यही दाल एक बर्तन में चढ़ा लेती थी और पकते वक्त उसमें आटे की टिकिया बना कर डालती जाती थी. बासी होने पर यह खाना उसे और ज्यादा लजीज लगता था.

पर मुचडू ने शायद ही कभी वह खाया हो. उसकी मां को भी इस बात का मलाल कभी नहीं हुआ. दरअसल मुचडू और उसकी मां के संसार बहुत अलग हो गए थे. कभी बहुत पढ़ी-लिखी और खाती-पीती दुनिया के परिवारों में भी यह होता है. वाल्दैन की दुनिया से बेटे की दुनिया कटकर अलग हो जाती है, पर अक्सर यह घटना उम्र कुछ ज्यादा होने पर होती है. मुचडू और उसकी मां के संसार तब से अलग हो गए थे, जब से मुचडू ने थोड़ा-सा चलना और बोलना सीख लिया था. उसे लगता था कि मां का काम भी घटिया किस्म का है और उसका बनाया खाना भी. वह गाती है या रोती है- इस पर भी उसने कभी ध्यान नहीं दिया.

मां गायब हो गई, तब भी मुचडू को कोई खास फर्क नहीं पड़ा था. और जब वह उसी तरह बिना आहट वापस लौट आई, तब भी मुचडू पर कोई असर नहीं दिखाई दिया. मुचडू की उम्र में जरूर इजाफा हो गया था और जो घुटन्ना अपने नंगे बदन पर वह पहनता था, उससे बाहर उसके जिस्म के हिस्से अनुपात से ज्यादा बड़े हो गए थे. इतने बरसों में मकान भी कुछ ज्यादा पुराने हो गए और गली भी. गली में जड़ी गई ईटें जगह-जगह गल गई थीं और वहां गढ़े बन गए थे, पर सबसे ज्यादा बड़ा परिवर्तन कुछ दूर से दिखाई दे जाता था. घरों में अब बिजली का इस्तेमाल ज्यादा था और बाशिंदों ने पानी के अपने-अपने नल अलग लगवा लिये थे.

सरकारी भाषा में इस विकास ने गली की शक्ल कुछ अजीब ही कर दी थी. गली के सिरे पर जो बिजली का खंभा था, उस पर सरकारी तार सिर्फ पांच थे, मगर घरों में जो तार बत्ती जलाने के लिए उससे जोड़े गए थे, उनका गुच्छा बहुत भारी हो गया था. दूर से देखने पर लगता था, वह बिजली का खंभा नहीं, मकड़ी का जाला उतारने वाला बांस हो, जिस पर बुरी तरह मकड़ी का जाला लिपट गया हो. इतनी ही अजीब शक्ल मकानों के चबूतरों के पास पानी के नलों की थी. वहां इतने ज्यादा नल थे कि वे मकान नहीं, किसी कारखाने के बॉयलर लगते थे.

इन्हीं में से एक में अब एक जंजीर से नन्हें बंधा रहता था. यानी एक बंदर. यह बंदर अतीक आठ रुपये देकर खरीद लाया था. बंदर बिलकुल बंदर जैसा ही लगता था, पर अतीक ने प्यार से उसका नाम रखा 'जहीनुद्दौला'. उसका ख्याल था कि वह नन्हा बंदर बहुत समझदार है, पर यह नाम ज्यादा चला नहीं.

उन दिनों कुछ लोग एक आंदोलन चला रहे थे. उसे वे 'हिंदू-जागरण अभियान' कहते थे. उनका ख्याल था कि सारे हिंदू सो रहे थे और मुसलमान जाग रहे थे. मुसलमान जाग रहे थे, इसलिए मजे लूट रहे थे. इस अभियान के चलते पास की कॉलोनी के लड़के बहुत उत्साहित थे. यह कॉलोनी शहर के बीच एक बड़े राजा के बगीचे में बसाई गई थी और शहर की घनी आबादी के बीच एक खूबसूरत नखलिस्तान थी.

इसमें मंगतराम जौहरी की कोठी भी थी और बिजली का सामान बेचने वाले अनंत मिश्र की भी. इसमें कुछ सेवानिवृत्त अफसर भी रहते थे और जगह-जगह अंतरराष्ट्रीय हिंदी आंदोलन करने वाले ठाकुर सर्वदमन सिंह का मकान भी यहीं था. इन लोगों की लड़कियां शादी से पहले पढ़ाई और गोपनीय प्रेम में व्यस्त रहती थी और लड़के बीच के छोटे पार्क में लकड़ी की महंगी थापियों से एक किस्म की ठोस गेंद खेलते रहते थे. ये लड़के ऐसे जुलूसों में काफी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे, जिनसे उन्हें अपने धर्म का संबंध दिखाई दे जाए. हिंदू-जागरण अभियान में भी वे हिस्सा ले रहे थे. इस कॉलोनी से मुख्य सड़क की तरफ निकलने के लिए एक बड़ा फाटक था और एक पतली-सी गली. इस गली की दोनों तरफ कभी राजा साहब के नौकरों की कोठरियों की कतार थीं. वही कोठरियां कोई आधी सदी के अंतराल में छोटे- छोटे दुमंजिले मकानों में तब्दील हो गई थीं, जिनमें से किसी-किसी में चार या पांच परिवार भी रहते थे. जिससे कभी राजा के हाथी अंदर आते थे, उस विराट फाटक के दोनों पायों में दर्जी, हलवाई, परचूनी और अंडा-मक्खन बेचने वालों की दुकानें थीं और ऊपर की मंजिल में राजा साहब के परिवार का निवास था और एक बड़ी-सी तख्ती, जिस पर लिखा था- महाराजाधिराज गोबू राय हाउस.

'हिंदू-जागरण अभियान' का छोटा-सा जुलूस लेकर गली से गुजरते हुए महाराजाधिराज का पोता संजय कुमार सिंह उर्फ मक्कू अतीक के बंदर को देखकर एकदम भड़क उठा. उसने सीना फुलाकर पान-मसाले की पीक धूकते हुए जोरदार आवाज में ललकारा- "अबे ओए अतीक के बच्चे, बाहर निकल!"

अतीक बाहर ही खड़ा था दबी आवाज में उसने पूछा, "क्या बात हो गई, राजा भैया? मैंने तो आपको झंडी लगा रखी है."

"अबे, भगवा लगाकर कौन-सा एहसान किया तूने, ऐं? भगवा नही लगाएगा, तब क्या पाकिस्तानी झंडा लगाएगा? ये बंदर तेरा है?" संजय कुमार सिंह उर्फ मक्कू ने पूछा.

"मेरा है राजा भैया, क्यों?"

"क्या नाम रखा है इसका ?"

"इसका? इस हरामी का नाम क्या होता, पर मैंने इसका नाम जहीनु‌द्दौला रखा है." कहकर अतीक  हंसा : साला बंदर होकर खासा जहीन है.

तब तक उस 'राजा भैया' संबोधित किए गए तगड़े लड़के ने उसका गला पकड़ लिया. तीन-चार बहुत भद्दी गालियां देकर अपने साथियों से बोला, "ये हरामी श्री राम-भक्त हनुमान जी को बंदर बता रहा है. अबे, ये बंदर है?"

देखते ही देखते वह थोड़ा-सा पिटा. ज्यादा नहीं. उन लोगों की रुचि पीटने से ज्यादा अपनी बात का वजन सिद्ध करने में थी. सहसा राजा भैया को याद आया, "और हां, ये जहीनुद्दौला क्या नाम हुआ? ये बंदर मुसलमान है?"

गली में जमा हुई भीड़ भी इस तर्क पर चकित हुई. खुद अतीक भी बहुत जल्दी समझ गया कि बंदर मुसलमान नहीं है.

इस हादसे के बाद उस बंदर का नाम अतीक ने बदल दिया. अब उसने उसका सीधा-सा नाम 'नन्हें' रख दिया, पर इस 'नन्हें' नाम के साथ भी एक मुसीबत खड़ी हो गई. एक दिन अलस्सुबह पूरे शहर में उथल-पुथल मच गई, हर कोई आसपास के मंदिरों की मूर्तियों को दूध पिलाने भागा जा रहा था- औरते, मर्द, बच्चे, बूढ़े, सभी. राजा के बगीचे की कॉलोनी में बने एक मंदिर में भी यही हो रहा था. लोग खुशी से उछल रहे थे- भगवान दूध पी रहे है, सचमुच, लोग मूर्ति के मुंह के पास चम्मच लगाते थे और दूध धीरे-धीरे गायब हो रहा था. 

संजय कुमार सिंह उर्फ मक्कू उर्फ राजा भैया व्यवस्था देख रहा था. और दूध का इंतजाम भी पूरे शहर में ही नहीं, पूरे देश में यह हो रहा था या किया जा रहा था.

पर इससे न अतीक का कोई संबंध था, ना ही उसके बंदर नन्हें का. अतीक अपने बंदर को हर सुबह सरकारी डेयरी से मिलने वाले सस्ते दूध का डेढ़ रुपये वाला एक पैकेट देता था. जल्दी ही बंदर दांत से उसमें सुराख करके सीधे उसी से दूध पीना सीख गया था. कभी-कभी यह पैकेट अतीक उसके लिए मुचडू से भी मंगा लेता था. मुचडू उस पैकेट को बंदर की तरफ उछाल देता था और बंदर हवा में किसी नट की तरह कलाबाजी खाकर उसे थाम लेता था.

जिस दिन मंदिरों में मूर्तियां दूध पी रही थीं, उस दिन पूरे शहर में दूध गायब हो गया था. दूध पिलाने के लिए बेहाल लोगों की काफी मदद राजा भैया ने की थी. जहां कहीं भी दूध हो सकता था, वहां से वह जुटा रहा था. इसी बीच उसने देखा- अतीक दूध का एक नन्हा पैकेट लिये जा रहा है. राजा भैया ने किसी बाज की तरह उसे जा दबोचा- “अबे, तू ये दूध कहां लिये जा रहा है? कालाबाजारी करेगा?"

“क्या बात करते हैं, राजा भैया!” अतीक घबरा कर बोला, “मैं तो यह नन्हें के लिए ले जा रहा हूं.”

"नन्हें? कौन नन्हें बे?"

"नन्हें, वही अपना बंदर..."

"बंदर! ये साला बंदरों को दूध पिलाएगा..."

उस दिन अतीक को और किसी पर नहीं, बंदर के उस बच्चे पर गुस्सा आया. वह गली में पहुंचा, तो बंदर ने खुश होकर कलाबाजी लगाई अतीक को लगा, वह उस पर एक ईंट दे मारे. बंदर शायद उसकी मनःस्थिति समझ गया वह पानी के नलों में से एक में बंधा रहता था. उन्हीं नलों पर वह उदास होकर दुबक गया था अतीक इसके बाद उससे इतना खीज गया था कि उसने उसे 'नन्हें' नाम से भी पुकारना बंद कर दिया था. पहले अपनी दुकान के कंप्यूटर के साथ-साथ बदर से भी उसे लगाव था, पर अब उसका सरोकार सिर्फ कंप्यूटर तक ही रह गया था.

कंप्यूटर बिजली से काम करने वाली एक खासी विकसित मशीन है. अतीक किसी समय गली के अपने उसी तग-से घर में छापेखानों के लिए छोटी-मोटी कंपोजिग किया करता था एक बार सऊदी अरब से लौटे उसके एक दोस्त ने उसे यह मशीन दिखाई. कुछ उधार और कुछ नकद जुटाकर अतीक उसे ले आया. इसके जरिए वह कंपोजिग से ज्यादा कुछ भी कर लेता था. इस मशीन ने मुचडू को भी आकर्षित किया. कुछ दिन वह बड़ी लगन से उसकी सफाई करता रहा. फिर एक दिन हिम्मत करके उसने उस पर अंगुलियां भी चलाई धीरे-धीरे अतीक से ज्यादा अच्छा काम वह खुद करने लगा, खास तौर से आकृतियां बनाने वाला काम चूंकि पढ़ा-लिखा कुछ नहीं था इसलिए इबारत में मार खा जाता था. मुचडू कंप्यूटर पर काम करता था, पर मजदूरी या नौकरी नहीं यह भी होता था कि वह सुबह थोड़ा-सा काम बिजली की उस मशीन पर करे, फिर थोड़ा काम दोपहर को किसी हलवाई की भ‌ट्ठी पर करे और शाम को मंगत की मसाला पीसने वाली मशीन की सफाई कर आए. एक और बहुत बड़ा काम उसे अनायास मिल गया था. गली के उसी बिजली के खंभे के तारों से उलझकर एक बार एक बंदर मर कर नीचे आ गिरा था. अगले रोज लोगों ने देखा-गली जहां बड़ी सड़क से मिलती है, वहीं किनारे पर मुचडू एक नए सुर्ख कपड़े के टुकड़े पर बंदर की वह लाश लेकर बैठा है. लाशों पर उसने गेंदे के फूल की माला पहना दी थी.

शाम तक उसका वह लाल कपड़े का टुकड़ा सिक्कों से भर गया था. बंदर की लाश के लिए गली के ही अकरम ने विमान बनाने का सामान दे दिया. अकरम पतंगें बनाता था. अकरम के दिए पतले लाल-पीले कागज और बांस की फाड़ी हुई छड़ियों से नाव जैसा एक विमान बनाया गया और आसपास के लोग बड़ी श्रद्धा के साथ बंदर की वह लाश नदी के किनारे गाड़ आए थे. तब वहां राजा भैया ने कीर्तन भी कराया था.

मुचडू की मां ऐसे ही दिनों में वापस आई थी. ज्यादा लोगों ने उसे नहीं देखा था, पर जिक्र बहुत दूर तक हुआ. गुपचुप. किसी ने उसे उसके बाद नीचे उतरते नहीं देखा. कोई ऊपर भी नहीं गया, कोई बच्चा भी नहीं. इतने बरसों में अरहर से दाल बनने का काम भी बंद हो गया था मुचडू की मां अब चक्की का गीत नहीं गाती थी. बहुत ज्यादा रात बीत जाने पर जो सुनाई देता था, वह एक दूसरा ही गाना था, बहुत कुछ एक स्यापे जैसा. कभी-कभी बहुत ध्यान देने पर पता लगता था, वह गा रही है- पीठ देखो रे माई, मेरी पीठ देखो, जैसे धोबी का पाट, इस तरह मारा है....

मुचडू को जल्दी ही एक बार फिर लोगों ने एक मरा हुआ बंदर लेकर बैठे देखा उसी तरह लाल कपड़े पर सजाए. इस बंदर को लोगों ने गली में मरते नहीं देखा था.

"ये कैसे मरा...?" गली के एक लड़के ने पूछा. "गिर कर."

"कहां गिरा था था?" ?"

"वहां. अमीनीगंज में."

“अबे, ये तेरे बदन को क्या हुआ? क्या बंदर के साथ तू भी गिरा था?"

मुचडू नाराज होकर चुप हो गया. उसके कंधे और पीठ पर खरोंचे और चोटें थीं. उसके लाल कपड़े पर इस बार और ज्यादा पैसे इकट्ठे हुए, क्योंकि वह मंगलवार का दिन था, जब लोग हनुमान की पूजा करते हैं. अगले रोज बाकायदा जुलूस के साथ ले जाकर इस बंदर को जमीन में दबा दिया गया. मुचडू फिर अपने उन्हीं कामों में लग गया-हलवाई के यहां भ‌ट्ठी तैयार करना और कंप्यूटर की दुम से बंधे चूहे की मदद से आकृति तैयार करना. इसके अलावा एक और काम उसका था. वह खाली वक्त में अतीक के बंदर को छेड़ता था और इस तरह उसी को नहीं, दूसरे लफंगों को भी मजा आता था, लेकिन पता नहीं कैसे, मुचडू के इसी एक काम में गड़बड़ी पैदा हो गई. अतीक का बंदर उससे चिढ़ने लगा. बहुत ज्यादा ही.

उसके चिढ़ने पर मुचडू को खीज हुई. एक दिन उसने सोचा कि वह उस बंदर को थप्पड़ रसीद दे. नजदीक आते ही वह नन्हा बंदर जोर से चीखा और उछला. फिर उछल-उछलकर चीखता ही गया.

मुचडू के नजदीक जाने पर बंदर के इस तरह उछलने और चीखने पर औरों का भी ध्यान गया.जे मुचडू अतीक के लिए किसी ग्राहक से चेक लेने गया था. ग्राहक ने चेक तो नहीं ही दिया, पर्चे पर बनाई आकृतियों में भी जमकर नुक्स निकाले। आकृतियां मुचडू ने ही बनाई थी और बुरी तो नहीं ही थी. वह खासा ही खीजा हुआ था. अतीक की दुकान के पास पहुंचने पर उसे देखकर नल से बंधा बंदर बुरी तरह चीखता हुआ उछले जा रहा था.

अतीक की दुकान के सामने वाले मकान के चबूतरे पर पान-मसाले के छोटे-छोटे पैकेटों की लड़ियां और सिगरेट-बीड़ी की एक नन्हीं-सी दुकान थी. यह दुकान गंगाराम बढ़ई के मरने के बाद उसकी बीवी ने खोल ली थी. दुकान पर छोटे बच्चों की पसंद की भी कुछ सस्ती चीजें मिलती थी. उस दुकान के आस-पास खाली चबूतरे पर गली के कई जवान लड़के आ बैठते थे. चूंकि उनके पास बहुत ज्यादा खाली वक्त होता था. इसलिए एक-दूसरे को गालियां देने के अलावा वे अतीक के बंदर से छेड़खानियां भी किया करते थे. उन्हें भी मुचडू को लेकर बंदर के इस बदले तेवर पर ताज्जुब हुआ. "अबे, साले ने किसी बंदरिया को छेड़ा होगा." उनमें से एक ने कहा और इस बेतुके मजाक पर सभी हंसे. आज मुचडू ने बंदर को बिलकुल नहीं छेड़ा था, बल्कि उसकी तरफ देखे बगैर दुकान पर आकर कंप्यूटर के सामने बैठ गया था. वह बंदर उसकी उपेक्षा के बावजूद उसी तरह चीखा था.

"ताज्जुब ही है.” अतीक आधी जली सिगरेट जेब से निकाल कर सुलगाते हुए बोला, "आखिर तूने इसके साथ किया क्या है?"

"मैं किसी दिन इसकी गर्दन मरोड़ दूंगा." चिढ़कर मुचडू ने कहा.

"हां, उसकी गर्दन मरोड़ दे. फिर लाल कपड़े पर उसकी लाश लेकर बैठ जा." अतीक ने व्यंग्य किया.

अतीक के इस व्यंग्य पर मुचडू को जैसे कंपकंपी छूट गई. उसने कंप्यूटर के चूहे पर से हाथ हटा लिया और उठ खड़ा हुआ.

"अबे, क्या हुआ?”

मुचडू ने अतीक को जवाब नहीं दिया. दुकान से नीचे उतरा और एक तरफ चल दिया.

"अबे, हद हो गई. साला, बिना कोई जवाब दिए ही सरक लिया."

“अतीक मियां, इस मुचडू के बच्चे को भी इसी बंदर के साथ बांध दो. अच्छा तमाशा रहेगा." लड़के अपने इस भौंडे से मजाक पर फिर हंसने लगे. अतीक ने बड़बड़ाते हुए सिगरेट बुझा दी और खुद कंप्यूटर पर आ बैठा. पर्दे के बीच गणेश की एक तस्वीर थी और कोने पर एक तिकोना झंडा था. कंप्यूटर पर एक धार्मिक उत्सव का पर्चा तैयार हो रहा था. पर्चे के कोने में झंडा बनना था और झंडे के बीच गणेश की तस्वीर. मुचडू ने गणेश के पैर के पास एक चूहा भी बना दिया था. अतीक खीझ गया: इस गधे को देखो साले ने अपनी तस्वीर भी बना दी है.

लड़के उत्सुक हुए : अपनी तस्वीर ? कंप्यूटर में? साले ने कंप्यूटर को कैमरा समझ लिया? "अबे, चूहा बनाया है." अतीक खीजकर बोला, "पर्चे पर एक इंच का तो झंडा होगा. उसके बीच नाखून के बराबर गणेश की तस्वीर होगी. चूहा तो साला राई बराबर भी नहीं होगा? छपने पर दिखाई देगा? साला कारीगरी दिखाएगा, अकल धेले की नहीं."

अतीक ने चूहा कंप्यूटर के पर्दे से हटाया और झंडे के बीच गणेश की तस्वीर बैठाने लगा, मगर जल्दी ही उसका ध्यान फिर मुचडू की तरफ चला गया. उसे लगा-मुचडू से चाय मंगाना और पीना जरूरी है. या चाय न भी सही, मुचडू गया कहां? वह कंप्यूटर छोड़कर चबूतरे पर आ खड़ा हुआ. मुचडू का कहीं पता नहीं था.

दरअसल अपने गुस्से के बावजूद गली के आगे की सड़क पर थोड़ा-सा आगे जाकर ही वह सहज हो गया. किसी की लाश ले जाई जा रही थी. जैसी सज-धज वाले लोग साथ थे, उन्हें देखकर मुचडू समझ गया कि शव-यात्रा किसी मालदार की है. ऐसी शव-यात्रा के साथ आमतौर पर वह काफी दूर तक चलता था, क्योंकि लाश पर उसके संबंधी लोग बताशे और मखानों के साथ पैसे भी उछालते चलते थे. आज जिस शव- यात्रा से वह आकर्षित हुआ था, उसमें भी मखाने और बताशों के साथ फूल उछाले जा रहे थे, पर उनके साथ सिक्के नहीं थे.

यह कैसी लाश है? उछाले गए सिक्के बच्चे भी उठाते थे, पर इस काम में मुचडू ज्यादा सफल होता था, क्योंकि वह बड़ा था, बच्चों को धकेल भी सकता था. एतराज कोई इसलिए नहीं करता था कि वह भी उन बच्चों जैसा ही फटेहाल था, पर इस लाश पर सिक्के नहीं उछाले जा रहे थे. ऐसी मृत्यु से उसे क्या सरोकार हो सकता था भला ? वह ठिठका, फिर मुड़कर उल्टी दिशा में बढ़ता चला गया.

जब वह गली की तरफ लौटा, तब खासी रात बीत चुकी थी. बहुत रात तक जागने वाली औरतें भी सो गई थी या खामोश थी. उस सन्नाटे में पहली बार उसने पतली मरी-मरी आवाज में गाया जाता अपनी मां का वह गाना सुना- पीठ देखो रे माई, मेरी पीठ देखो, जैसे धोबी का पाट... इस तरह मारा है.

मुचडू के शरीर पर उस दिन जो चोटें आई थीं और जिनके बारे में उसने किसी से कुछ नहीं कहा था, वे चोटें कुछ इस तरह बिटखने लगीं, जैसी उनकी पपड़ियों के नीचे कुछ बढ़ने या फूलने लग गया हो. जैसे चोटों के फेफड़ों में सांस भर रही हो. उनमें जलन होने लगी जलन सिर्फ वहीं नहीं, शरीर के अंदर तक.

एक बार मुचडू ने गली के आर-पार देखा. गली में ज्यादा अंधेरा नहीं था. अतीक के बंदर की नींद टूट गई थी और वह बहुत खामोशी से आंखे फाड़कर मुचडू को देख रहा था मुचडू ने भी उसे देखा. बंदर कुछ ज्यादा सावधान हो गया. मुचडू के जबड़े भिंच गए. वह स्थिर गति से आगे बढ़ता रहा. करीब आते ही बंदर चीखा और उछला. मुचडू बेहद फुर्ती से बंदर की जंजीर की तरफ झपटा. बंदर चीख-चीखकर उछलने लगा. बंद दरवाजों के अंदर से अतीक की झल्लाई उनींदी आवाज आई, "अबे, क्या है? साला कुत्तों को देखकर नौटंकी कर रहा है!"

बाकी कोई कुछ नहीं बोला. कोई बाहर भी नहीं आया. मुचडू ने बंदर की जंजीर खोल ली और उसे उसी तरह घसीटता हुआ तेजी से अपने घर की सीढ़ियां चढ़ गया. ऊपर की मंजिल पर टिन के सायबान के नीचे के फर्श पर बने सुराख के पास बैठी उसकी मां उसी तरह गाती रही- 'मेरी पीठ देखो रे माई...

चीखते-उछलते बंदर को जंजीर से लगभग टांगे हुए मुचडू किनारे की दीवार पर पंजा फंसा कर टिन के ऊपर चढ़ा और ऊपर की बिना मुंडेर की छत पर चला गया. अगली दो छतें लांघने में उसे कठिनाई नहीं हुई और अब वह ठीक वहां पहुंच गया, जहां बिजली के खंभे का वह सिरा था, जिसमें मकड़ी के जाले की तरह सैकड़ों तार उलझे हुए थे.

अब सिर्फ उसे बंदर के गले से जंजीर खोलनी थी. बंदर ने सहसा चीखना बंद कर दिया. मुचडू को संतोष हुआ कि बंदर शायद थक गया है. उसकी जंजीर खोलकर उसे खंभे के तारों की उस गुंजलक पर उछाल भर देना है. बाकी काम खुद हो जाएगा. उसे सुर्ख कपड़े पर पड़ी बंदर की लाश और सिक्के दिखाई दिए. ठीक उसी क्षण उस बंदर ने उछाल मारी और उसके कंधे के पास चिपट गया. दांतों और नाखूनों से हुए उस हमले से बचने के लिए उसने अपना सर पीछे खींचा और इसके बाद जो कुछ भी मुचडू में पिछले कुछ घंटों में पैदा हुआ था, उसे लिए-दिए वह तारों के उसी गुंजलक पर गिरा. काफी देर तक बिजली के तार पटाखों जैसी आवाज कर के आतिशबाजी जैसी छोड़ते रहे. हाथ में फंसी जंजीर के साथ बंदर लिए हुए मुचडू जैसे एक क्षण के कुछ हिस्से तक उन तारों की आतिशबाजी में तैरा, फिर चीखता हुआ गली में जा गिरा. गली में कुछ देर वैसे का वैसा ही सन्नाटा बना रहा. फिर भीड़ एक साथ चारों तरफ से इक‌ट्ठी होने लगी.

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